Saturday, April 30, 2011

प्रणय और आत्म संगिनी पर एक कविता

मै तुझसे नाराज नही बस खुद से परेशान हूँ
लुट कहाँ किस्मत गयी बस हैरान हूँ

तकदीर की लकीरों का अब भरोसा नहीं रहा
कभी रूठी जिंदगी और मौत का दर्द कभी सहा
वो मेरी खोयी अमानत पहले क्यों ना मिल पाई
कोमल भावनाए क्यों ना पहले देख ये दिल पाई

मै तो आपका खुल गया तकदीर का ताला हूँ
इश्वर का पिछले जन्मो का पुण्यो का रखवाला हूँ
ना मै सिर्फ एक खुशनुमा दौर या तेरी सच्चाई का सबूत हूँ
जिसे तुझे पूरी जिंदगी सौंपनी वो समर्पित देवदूत हूँ

सब तर्क सालो के मैंने पलो में तोड़ देने हैं
बंधन सदियों के तुने क्षणों में खोल लेने है
तेरे नए रिश्ते एक दिन तुने खुद जोड़ लेने है
मंजिल जिसकी मै उधर रस्ते मोड़ देने है

मेरे पास अगर विकल्प होता तो क्यों तुझे मै चुनता
और इश्वर तो दयानिधि जो हरपल आपकी दुआ सुनता
आत्मा को आत्मा से मिलाने के क्यों मै संकल्प बुनता
पल पल तेरी रगों में पवित्रता का रक्त जैसे घुलता

तू सच्चाई और ईमानदारी से बनी एक भोली गुडिया है
बच्चो से भी कोमल भावनाओ वाली तेरी एक दुनिया है
अपने हिसाब से ही चीजों को सीधा सीधा तुने देखा था
बीत गया वो दौर अब जो कभी बुरे भाग्य की रेखा था

तेरे चरणों में झुक जाने का मन करता है
सांसो में तेरी बस जाने को भगवान तरसता है
एक अक्स जैसे दो शरीरो में प्राण धरा करता है
दर्द तभी सारा तेरा वीरेन की आँखों से बहा करता है